Lucknow के युवाओं, खासकर जेन-जी के बीच एक नई समस्या तेजी से बढ़ रही है, जिसे “डिजिटल क्लटर” कहा जा रहा है। मोबाइल फोन, लैपटॉप और टैबलेट में हजारों फोटो, बेकार स्क्रीनशॉट, पुराने वीडियो, अनयूज्ड ऐप्स और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन अब युवाओं की मानसिक शांति और प्रोडक्टिविटी पर असर डाल रहे हैं।
कई कॉलेज स्टूडेंट्स और युवा प्रोफेशनल्स का कहना है कि ऑनलाइन क्लास, सोशल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन के बढ़ते इस्तेमाल के कारण डिजिटल डेटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे डिवाइस स्लो होने के साथ-साथ मानसिक तनाव भी महसूस होने लगा है।
हर समय नोटिफिकेशन से बढ़ रही बेचैनी
विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल क्लटर केवल स्टोरेज की समस्या नहीं है, बल्कि यह मानसिक थकान से भी जुड़ा हुआ है। लगातार आने वाले मैसेज, ईमेल और सोशल मीडिया नोटिफिकेशन दिमाग को आराम नहीं करने देते। कई युवा देर रात तक मोबाइल स्क्रॉल करते रहते हैं, जिससे उनकी नींद और दिनचर्या प्रभावित हो रही है।
लखनऊ के कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि डिजिटल ओवरलोड के कारण युवाओं में ध्यान भटकने, तनाव और एंग्जायटी जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
जेन-जी अपना रहे नए तरीके
इस समस्या से बचने के लिए अब कई युवा “डिजिटल डिटॉक्स” और “डिक्लटरिंग” जैसे तरीके अपना रहे हैं। कुछ लोग हर सप्ताह अनावश्यक फोटो और ऐप्स डिलीट करते हैं, जबकि कई लोग सोशल मीडिया स्क्रीन टाइम सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं।
इसके अलावा क्लाउड स्टोरेज और फाइल मैनेजमेंट ऐप्स का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है, ताकि जरूरी डेटा को व्यवस्थित रखा जा सके। कई युवाओं ने नोटिफिकेशन बंद करना और सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाना भी शुरू किया है।
बदलती लाइफस्टाइल का असर
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल दुनिया आज युवाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा डिजिटल निर्भरता नई चुनौतियां भी पैदा कर रही है। ऐसे में समय-समय पर डिजिटल सफाई और स्क्रीन टाइम कंट्रोल करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी होता जा रहा है।
